पाठ्यपुस्तक आधारित विस्तृत नोट्स (~1850 शब्द) | लिखित परीक्षा हेतु विशेष
पाठ संख्या: 23 | NIOS हिंदी (301)
अनुभाग 1: प्रयोजनमूलक भाषा एवं प्रयुक्ति की मूल संकल्पना(पृष्ठ 116-118)
1.1 प्रयोजनमूलक भाषा: परिभाषा एवं आशय
प्रयोजनमूलक भाषा (Functional Language / Language for Specific Purpose) वह भाषा है जो किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयोग की जाती है। रोजमर्रा के जीवन की विविध विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जो भाषा प्रयोग में लाई जाती है, वह प्रयोजनमूलक भाषा होती है। इसका क्षेत्र सीमित होता है और मुख्य लक्ष्य जीविकोपार्जन का साधन है।
यह भाषा प्रशासन, विधि, बैंक, पत्रकारिता और वाणिज्य के विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होती है। ये सभी क्षेत्र औपचारिक भाषा प्रयोग के क्षेत्र हैं। डॉक्टर, वकील, पत्रकार, वैज्ञानिक और व्यापारी आदि अपने कार्य क्षेत्रों में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वही प्रयोजनमूलक भाषा का रूप धारण करती है।
मूल अवधारणा: विषयगत, भूमिकागत और संदर्भगत प्रयोगों के कारण भाषा-प्रयोग में जो अनेक विविधता पैदा होती है उसे भाषा-विज्ञान के क्षेत्र में भाषा-प्रयुक्ति (Register) कहा जाता है।
1.2 प्रयुक्ति की संकल्पना एवं परिभाषाएँ
प्रयुक्ति शब्द ‘प्रयुक्त’ में ‘इ’ प्रत्यय लगाकर बना है। प्रयुक्त का अर्थ है प्रयोग में लगा हुआ। भाषा का जो रूप किसी विषय में बार-बार प्रयुक्त होता है वह उस क्षेत्र की भाषिक विशिष्टता बन जाता है। यही भाषिक विशिष्टता उस विषय क्षेत्र की प्रयुक्ति कहलाती है। हिंदी में यह अंग्रेजी के Register शब्द का पर्याय है।
रीड के अनुसार: “जब कोई व्यक्ति भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से एक जैसी स्थितियों में एक जैसा व्यवहार नहीं करता। विभिन्न सामाजिक स्थिति में उसका व्यवहार (भाषिक) बदलता जाता है। वास्तव में वह विभिन्न भाषा प्रयुक्तियों का प्रयोग करता है।”
डॉ. भोलानाथ तिवारी: “जब किसी भाषा का प्रयोग विभिन्न विषयों में होता है तो उसके तरह-तरह के रूप विकसित हो जाते हैं, जिन्हें ‘प्रयुक्ति’ कहते हैं।”
डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव: “किसी निश्चित परिस्थिति में सामाजिक दायित्व के निर्वाह के निमित्त वक्ता द्वारा प्रयोग में लाई गई भाषा शैली ही ‘प्रयुक्ति’ है।”
प्रयुक्ति की संकल्पना के साथ सामाजिक भूमिका की संकल्पना जुड़ी होती है। एक व्यक्ति परिवार का मुखिया, अध्यापक, व्यवसायी या वैज्ञानिक हो सकता है और इन अलग-अलग भूमिकाओं में वह भिन्न-भिन्न भाषारूपों का व्यवहार करता है।
परीक्षा उपयोगी संकेत: परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है—प्रयोजनमूलक भाषा और प्रयुक्ति में अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर में लिखें कि प्रयोजनमूलक भाषा व्यापक अवधारणा है जबकि प्रयुक्ति उसका विशिष्ट रूप (Register) है।
अनुभाग 2: प्रयुक्ति के प्रमुख आधार(पृष्ठ 119-120)
2.1 शब्दावली (Vocabulary)
शब्दावली प्रयुक्ति निर्धारण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। दो रूपों में इसका निर्वहन होता है:
- क्षेत्र विशेष की विशिष्ट शब्दावली: अणु, परमाणु, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि विज्ञान विषय की शब्दावली।
- एक ही शब्द के भिन्न अर्थ: ‘पद’ शब्द कविता में ‘छंद’ के लिए, आम बोलचाल में ‘पैर’ के लिए और प्रशासन में ‘ओहदा’ के लिए प्रयुक्त होता है।
Director शब्द का उदाहरण: प्रशासन में ‘निर्देशक’, फिल्म में ‘निर्देशक’, पुलिस में ‘पुलिस महानिर्देशक’—प्रयोग क्षेत्र के अनुसार अर्थ बदल जाता है।
2.2 अन्य चार आधार
भाषा प्रयोग का विषय-क्षेत्र: विधि क्षेत्र में ‘बनाम’ शब्द का निश्चित अर्थ होता है—दो पक्षों के बीच मुकदमा। अन्य क्षेत्रों में यह शब्द अन्य अर्थों में भी प्रयुक्त हो सकता है।
भाषा संप्रेषण का तरीका: लिखित संप्रेषण में औपचारिकता और सतर्कता मौखिक से अधिक होती है।
वक्ता/लेखक या श्रोता/पाठक की स्थिति: वकील कोर्ट रूम में, सहयोगियों से और घर में अलग-अलग भाषा व्यवहार करता है।
औपचारिक और अनौपचारिक भाषा प्रयोग: घर में अनौपचारिक जबकि कोर्ट में पूरी तरह औपचारिक और सचेत भाषा।
महत्वपूर्ण: ये पाँच आधार हर प्रयुक्ति पर लागू होना आवश्यक नहीं है। प्रयुक्ति भाषा के भीतर एक विशिष्ट रूप है जिसमें उस भाषा की व्यापक विशेषताएँ स्वतः आ जाती हैं।
अनुभाग 3: सामान्य व्यवहार एवं साहित्यिक हिंदी(पृष्ठ 122-123)
3.1 सामान्य व्यवहार या बोलचाल की हिंदी
दैनिक जीवन में बातचीत के रूप में प्रयुक्त हिंदी। इसमें व्याकरणिक नियमों का कोई निश्चित बंधन नहीं होता। विभिन्न क्षेत्रों में इसके रूप:
- बंबईया हिंदी: मराठी, गुजराती, राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी का प्रभाव। उदाहरण: “काहे कूँ, रे दादा, खाली पीली गरीब का ऊपर गजब करता है।”
- दिल्ली की हिंदी: पंजाबी और हरियाणी का प्रभाव। लिंग अशुद्धियाँ आम—‘मेरे दादीजी’।
- कोलकाता की हिंदी: बांग्ला प्रभाव—‘तुम्हारा बहुत बड़ी गलती’।
- हैदराबादी हिंदी: दक्षिण भारतीय भाषाओं का प्रभाव—‘तुमको क्या होना?’
- ऐंग्लो हिंदी: अंग्रेजी मिश्रित—‘मैं यूनिवर्सिटी कैम्पस में खड़ा हूँ।’
3.2 साहित्यिक हिंदी
साहित्य सृजन में प्रयुक्त हिंदी में अभिधा, लक्षणा और व्यंजना तीनों शब्द शक्तियों का प्रयोग होता है। यह लालित्यपूर्ण, सरस और संवेदनशील होती है। दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ इसका जीवंत उदाहरण हैं:
“हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए। इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।”
गद्य में भी साहित्यिक हिंदी आत्मसम्मान, विद्रोह और यथार्थ की गहरी अनुभूति जगाती है।
अनुभाग 4: कार्यालयी, वाणिज्यिक, वैज्ञानिक एवं विधिक हिंदी(पृष्ठ 124-128)
4.1 कार्यालयी / प्रशासनिक हिंदी
14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला। इसकी विशेषताएँ—सरलता, स्पष्टता और बोधगम्यता। औपचारिक किंतु विज्ञान की भाषा से भिन्न। आत्मनिष्ठता नहीं होती।
विशिष्ट शब्दावली: समसंख्यक, तदर्थ, निर्देश, अवर सचिव आदि। कर्मवाच्य का प्रयोग खास विशेषता है—“मुझे आपसे अनुरोध करने का निर्देश हुआ है।”
4.2 वाणिज्य, व्यापार एवं बैंकिंग हिंदी
बैंकिंग शब्दावली की सात श्रेणियाँ:
- अंग्रेजी और अरबी-फारसी शब्द: बकाया, सौदा, अदायगी, बजट
- संस्कृतनिष्ठ तत्सम + बोलचाल: क्षतिपूर्ति-मुआवजा, व्यवसाय-कारोबार
- परम्परागत देशी: हुँडी, गिरवी, साहूकार, बट्टा
- संकर शब्द: रद्द नोट, नकदी प्रमाण पत्र
- निर्मित शब्दावली: शीर्ष (एपेक्स), निविदा (टेंडर)
- संस्कृतनिष्ठ: निधि, अवमूल्यन, आवंटन
- अंग्रेजी शब्दानुवाद: कराधान, मुक्त अर्थव्यवस्था
4.3 वैज्ञानिक-तकनीकी एवं विधि हिंदी
वैज्ञानिक हिंदी: विषय-वस्तु प्रधान, भाषा-शैली गौण। संकेतों और प्रतीकों का प्रयोग (π, g, α, β)। संस्कृत शब्दावली + अंग्रेजी शब्द।
विधि हिंदी: सुनिश्चित, सतर्क और पर्याय-रहित। ‘अनुच्छेद’, ‘उपबंधित’, ‘विनिर्दिष्ट’ जैसे शब्द केवल विधि क्षेत्र में निश्चित अर्थ रखते हैं।
अनुभाग 5: संचार माध्यम एवं विज्ञापन की हिंदी(पृष्ठ 129-130)
5.1 संचार माध्यमों में हिंदी
दो रूप—लिखित (समाचारपत्र) और मौखिक (रेडियो, टीवी, सोशल मीडिया)। अखबार में संक्षिप्तियाँ (भाजपा, सपा) अधिक जबकि इलेक्ट्रॉनिक माध्यम में कम। भाषा सहज, सरल, स्पष्ट और बोधगम्य होनी चाहिए क्योंकि सभी वर्गों से संप्रेषण होता है।
विशिष्ट शब्द: प्राइम टाइम, सीधा प्रसारण, ऑन कैमरा, सम्पादकीय।
5.2 विज्ञापन के क्षेत्र में हिंदी
तीन रूप—दृश्य, श्रव्य और मुद्रित। उद्देश्य केवल सूचना नहीं बल्कि ध्यान आकर्षित करना। व्यापारिक विज्ञापन में आकर्षण, प्रचारपरक में प्रभाव, रोजगार संबंधी में स्पष्टता अपेक्षित।
उदाहरण: “टाटा स्काई—इसको लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला।” | “घड़ी डिटर्जेंट—पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें।”
सारांश: हिंदी के आठ प्रमुख प्रयुक्ति-क्षेत्र—सामान्य व्यवहार, साहित्यिक, कार्यालयी, वाणिज्य-बैंकिंग, वैज्ञानिक-तकनीकी, विधि, संचार माध्यम और विज्ञापन—समाज और ज्ञान के विकास के साथ निरंतर विस्तार पा रहे हैं।
उच्च अंक प्राप्ति हेतु 5 स्वर्णिम नियम
पाठ्यपुस्तक के सिद्धांतों पर आधारित ये 5 बिंदु परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्नों में पूरे अंक सुनिश्चित करते हैं:
नियम 1: प्रयोजनमूलक भाषा बनाम प्रयुक्ति
प्रयोजनमूलक भाषा व्यापक अवधारणा है—किसी विशेष प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रयुक्त भाषा। प्रयुक्ति (Register) उसका विशिष्ट रूप है जो विषय, भूमिका और संदर्भ के कारण उत्पन्न होता है। परीक्षा में दोनों को मिलाकर न लिखें।
⚠️ सामान्य भूल: प्रयुक्ति को केवल शब्दावली समझना; सामाजिक भूमिका और संदर्भ भी अनिवार्य तत्व हैं।
नियम 2: प्रयुक्ति के पाँच आधार याद रखें
शब्दावली, विषय-क्षेत्र, संप्रेषण का तरीका, वक्ता/श्रोता की स्थिति और औपचारिक-अनौपचारिक स्थिति—ये पाँच आधार हैं। हर प्रयुक्ति पर सभी लागू होना आवश्यक नहीं।
⚠️ सामान्य भूल: केवल शब्दावली को आधार मानना; विषय-क्षेत्र और औपचारिकता भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
नियम 3: कार्यालयी हिंदी की तीन विशेषताएँ
सरलता, स्पष्टता और बोधगम्यता। कर्मवाच्य का प्रयोग (“निर्देश हुआ है”) इसकी शैलीगत पहचान है। 14 सितंबर 1949 राजभाषा घोषणा तिथि अवश्य लिखें।
⚠️ सामान्य भूल: कार्यालयी भाषा को विज्ञान की भाषा जैसी कठोर औपचारिकता समझना; यह जनता के लिए बोधगम्य होनी चाहिए।
नियम 4: बैंकिंग शब्दावली की सात श्रेणियाँ
अंग्रेजी-अरबी, संस्कृत+बोलचाल, परम्परागत देशी, संकर, निर्मित, संस्कृतनिष्ठ और शब्दानुवाद—इन सात श्रेणियों को उदाहरण सहित याद रखें। परीक्षा में श्रेणीबद्ध उत्तर उच्च अंक दिलाता है।
⚠️ सामान्य भूल: केवल अंग्रेजी शब्दों को गिनाना; हुँडी, गिरवी जैसी देशी शब्दावली भी महत्वपूर्ण है।
नियम 5: विधि भाषा में पर्याय की छूट नहीं
विधिक भाषा सुनिश्चित और सतर्क होती है। ‘अनुच्छेद’, ‘उपबंधित’, ‘विनिर्दिष्ट’ जैसे शब्दों के स्थान पर कोई पर्याय नहीं लगाया जा सकता। यह वैज्ञानिक भाषा से भी अधिक कठोर है।
⚠️ सामान्य भूल: विधि और वैज्ञानिक भाषा को एक समान समझना; विधि में पर्याय-निषेध विशेष नियम है।