देश प्रेम क्या है ? प्रेम ही तो है। बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता। इस प्रेम का आलंबन क्या है ? क्या सारा देश अर्थात मनुष्य, पशु – पक्षी, नदी – नाले, वन – पर्वत, सागर अर्थात सारी भूमि उसके सभी जीव – देश ही तो है। यह प्रेम किस प्रकार का है ? साहचर्यगत प्रेम है। जिनके बीच हम रहते हैं, जिन्हें हम रोज़ आँखों से देखते हैं, जिनकी बातें हम रोज़ सुनते हैं अर्थात जिनके साथिय के हम अभ्यासी हो जाते हैं। पशु और बालक भी जिनके साथ अधिक रहते हैं, उनसे चिपक जाते हैं। यह परिचय परिचय ही है और परिचय ही प्रेम का प्रवर्तक है। यदि प्रेम वास्तव में अन्तःकरण का कोई भाव है तो देश के स्वरूप से परिचित और अभ्यस्त हो जाइए।
बाहर निकलिए तो आँख खोलकर देखिए कि खेत कैसे लहलहा रहे हैं, नाले झाड़ियों के बीच कैसे बह रहे हैं, कछारों में चौपायों के झुंड इधर – उधर चरते हैं, चरवाहे तान लड़ा रहे हैं, उनमें घुलिए, देखिए तो क्या हो रहा है। जो मिले उनसे दो बातें कीजिए, इसलिए कि वे सब हमारे देश के हैं। इस प्रकार जब देश का रूप आपकी बुद्धि में समा जाएगा, आप उसके अंग-प्रत्यंग से परिचित हो जाएँगे, तब आपके अंतःकरण में इच्छा का सचमुच उदय होगा कि वह कभी न छूटे, वह सदा हरा – भरा और फला – फूले रहे, उसके धन धान्य की वृद्धि हो, उसके सभी प्राणी सुखी रहें।
(i) ‘परिचय’ का अभिप्राय : अपने परिवेश, देश की भूमि, प्रकृति और वहाँ रहने वाले समस्त मनुष्यों व जीवों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क, साहचर्य और आत्मीय जुड़ाव स्थापित करना। जैसे पशु और छोटे बच्चे भी निरंतर साथ रहने पर अपने पालक से सहज ही चिपक जाते हैं, वही घनिष्ठ साहचर्य ही सच्चा परिचय है।
(ii) परिचय को प्रेम का प्रवर्तक क्यों माना : बिना जाने-पहचाने किसी अज्ञात सत्ता से सच्चा अनुराग संभव नहीं है। जब हम किसी के साथ निरंतर रहते हैं और उसके स्वरूप से भली-भाँति अभ्यस्त हो जाते हैं, तब अंतःकरण में उसके प्रति स्वाभाविक आकर्षण व स्नेह उत्पन्न होता है; इसीलिए परिचय ही प्रेम का जन्मदाता व ‘प्रवर्तक’ है।
(iii) देश के स्वरूप से परिचित होने हेतु आवश्यक कार्य : मनुष्य को कमरों से बाहर निकलकर खुली आँखों से खेतों की लहलहाहट, कल-कल बहते नाले, कछारों में चरते पशुओं के झुंड तथा चरवाहों की तान देखनी होगी; प्रकृति में घुलना-मिलना होगा और मार्ग में मिलने वाले साधारण लोगों से आत्मीयता से दो बातें करनी होंगी।
(iv) मन में उत्पन्न मंगलमयी भावनाएँ : देश के अंग-प्रत्यंग से परिचित होने पर यह भावना जन्म लेती है कि हमारा देश हमसे कभी न छूटे, यह सदैव हरा-भरा और फला-फूला रहे, यहाँ धन-धान्य की नित्य वृद्धि हो तथा देश के समस्त प्राणी सुखी, निरोग और आनंदित रहें।
(v) उपयुक्त शीर्षक : सच्चा देशप्रेम और परिचय (अथवा देशप्रेम का वास्तविक स्वरूप)